Thursday, November 24, 2011

असहनशीलता के पथ पर क्रांति की ओर ...

हाल के दिनों में राजनीतिज्ञों और बड़ी शख्सियतों पर हमले की एक के बाद एक कई वारदातें सामनें आई हैं...ये पहली बार  नहीं कि किसी नेता को किसी व्यक्ति के गुस्से का शिकार होना पड़ा है... इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण पर हमला हुआ....कई मंत्रियों पर हमला हो चुका है..गृह मंत्री पी चिदम्बरम तक हमले के शिकार वाले फेहरिस्त में शुमार हो चुके हैं...हमले के बाद लोग अलग अलग तर्कों के साथ बयान  देते नज़र आते हैं...शरद पवार पर किये गए हमले के बाद कई राजनीतिज्ञों और नेताओं ने इसे सुरक्षा में सेंध बतलाया तो कईयों ने एक तरह से हमलावर का बचाव करने वाले अंदाज़ में इसे सरकार और शासन के प्रति गुस्से और उबाल का परिणाम बताया....लेकिन अगर इस तर्क को माने कि लोग महंगाई और भ्रष्टाचार से त्रस्त हो चुके हैं और उनके पास कोई चारा नहीं...क्या वाकई इस तर्क को जायज़ और वाजिब ठहराया जा सकता है..? क्या हमारा विश्वास कानून व्यवस्था और संवैधानिक ढांचे से उठ चुका है...? जब कोई पुलिसवाला बदसुलूकी करता है तो हम कानून का हवाला देकर उसे कानून की अवहेलना बताते हैं....लेकिन क्या कानून व्यवस्था और नैतिकता की ज़िम्मेदारी सिर्फ पुलिस महकमे और प्रशासनिक तबको पर ही है.....क्या हमारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं बनती..... हमारी सहनशीलता का स्तर इतना गिर चुका है कि हम लात, घूसों और थप्पड़ के नीचे बात नहीं कर सकते..? क्या आज भगत सिंह और उन जैसे क्रांतिकारी इतने सस्ते हो गए हैं कोई भी राह चलता हुआ किसी को थप्पड़ मार दे और खुद को क्रांतिकारी साबित कर भगत सिंह के उसूलों को ठेस पहुंचाए....इन सब घटनाओं के दरम्यान गांधीवादी अन्ना हजारे की शुरूआती प्रतिक्रिया काफी चौंकाने वाली रही...अन्ना ने शरद पवार को थप्पड़ लगने वाली घटना पर तुरंत ही व्यंग्य वाले अंदाज़ में कहा "बस एक ही मारा..." हालांकि इसके बाद अन्ना अपनी इस प्रतिक्रिया पर सफाई देते फिर रहे हैं कि मेरा मतलब वो नहीं था...लेकिन अन्ना ने जो कहा और जिस अंदाज़ में कहा वो टीवी पर बैठे दर्शक पूरे गौर से देख रहे थे...कुछ बुद्धिजीवियों ने तो बिना सोचे समझे यह कह दिया कि लोगों का गुस्सा तो एक दिन फूटना ही था...लेकिन क्या इस गुस्से की परिणति लात, घूसों और मारपीट के रूप में स्वीकार करने के लिए आम अवाम तैयार है...संभवतः इसका जवाब नहीं में ही होगा...इस तरह की चीज़ों को कतई जायज़ नहीं ठहराया जा सकता...यह वाकई खतरनाक संकेत है...चंद लोगों के असहिष्णु क़दम को किसी कीमत पर क्रान्ति की शुरुआत कहना मूर्खता होगा...अगर हम सत्ता और शासन के खिलाफ मध्य-पूर्व के देशों में पैदा हुए हालत और लोगों के विरोध की प्रकृति पर गौर करेंगे तो हम पाएंगे कि वहां भी लोगों ने तबतक हिंसक रूप नहीं अपनाया जबतक सत्ता की तरफ से पहले कार्रवाई नहीं हुई...इसके बाद हम नतीजे पर पहुंचेंगे तो पता चलेगा कि अभी भारत की जनता मानसिक रूप से किसी भी परिवर्तन के लिए तैयार ही नहीं है सिवाय खुद को भगत सिंह और क्रांतिकारी बताने के..

Wednesday, September 7, 2011

रेस रोमांच की भूल-भुलैया में ले जाने वाला फॉर्मूला

भारत में फॉर्मूला वन रेस की तैयारियां जोर शोर से चल रही है। ग्रेटर नोएडा के रेसिंग ट्रैक को रेसरों के लिए तैयार किया जा रहा है। टिकटों की बिक्री के आंकड़ों को देखकर ऐसा लग रहा है कि भारत के लोग रेसिंग को लेकर कितने क्रेजी हैं। टीवी चैनलों से लेकर एफएम रेडियो स्टेशनों तक हर जगह खबरें छाई हुई हैं, बल्कि यूं कहना ज्यादा बेहतर होगा कि इन माध्यमों के जरिए इमर्जिंग इंडिया और भारत के आर्थिक महाशक्ति बनने का विज्ञापन पेश किया जा रहा है।
फॉर्मूला वन रेस भारत में उस वक्त अखबारों और टेलीविजन चैनलों की सुर्खियां बना जब एक भारतीय रेसर ने फॉर्मूला वन रेस में पदार्पण किया। पैसों से सराबोर इस खेल में एक भारतीय के प्रतिनिधित्व की खबर से तो ऐसा लगा जैसे हमने दुनिया ही जीत ली हो। नारायण कार्तिकेयन ने ऑस्ट्रेलियन ग्रैंड प्रिक्स 2005 से अपने करियर की शुरुआत की। इसके बाद अचानक से एक शौकीन भारतीय कॉरपोरेट विजय माल्या की नजर इस ड्राइवर पर पड़ी तो उसने फॉर्मूला वन में फोर्स इंडिया नाम से एक टीम लॉंच कर डाली और इस तरह फॉर्मूला वन में भारतीय प्रतिनिधित्व के नाम पर भारतीय लोगों के इमोशनल अत्याचार का प्रयास शुरु हुआ।
हालिया कुछ सालों में दुनिया की नजर में भारत आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरकर सामने आया। ऐसे में भारत में इस खेल का आयोजन भारतीय कॉरपोरेट घरानों के लिए इज्जत का सवाल बन गया। कॉरपोरेट समूहों को इसमें सफलता भी मिली और भारत में इस खेल के आयोजन को हरी झंडी भी मिल गई। लेकिन भारत की वैश्विक इज्जत बढ़ाने वाले इन कॉरपोरेट समूहों ने अपनी बुद्धिमता का प्रदर्शन करते हुए एक चूक कर ही डाली। दरअसल इस महंगे खेल का आयोजन भारत के किसी हाईटेक माने जाने वाले शहर मसलन बंगलुरू या हैदराबाद में न करवा कर इसकी मेजबानी ऐसे राज्य में कराए जाने का फैसला लिया गया जो खुद ही अभावग्रस्त और पिछड़ेपन से निकलने का रास्ता तलाश रहा है। खासकर इस खेल का आयोजन स्थल बहुत ही दिलचस्प है। उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा को इसकी मेजबानी सौंपी गई संभवतः इसलिए कि यह राष्ट्रीय राजधानी से सटा होने के साथ-साथ प्रदेश के दूसरे इलाकों की अपेक्षा ज्यादा विकसित है। दुर्भाग्य से ग्रेटर नोएडा हाल के दिनों में ऐसे रूप में पेश हुआ जिसने सरकार और कॉरपोरेट माफियाओं जैसे बिल्डरों, रीयल एस्टेट मालिकों द्वारा गरीब किसानों के शोषण और उन्हें सड़क का रास्ता दिखाने की पोल खोल दी। एक तरफ फॉर्मूला वन के लिए चिकने रोड और वर्ल्ड क्लास रेसिंग ट्रैक को तैयार किया गया तो दूसरी तरफ किसानों को सड़कों पर ला खड़ा कर उनपर अत्याचार किए गए। जब निहत्थे किसानों पर बर्बर कार्रवाई की गई उस वक्त इन कॉरपोरेट घरानों को भारतीय इज्जत की परवाह नहीं थी। दरअसल उन किसानों की परवाह की भी क्यों जाए आखिर इनसे धनकुबेरों को क्या फायदा पहुंचने वाला।
इस आयोजन के पीछे जो एक खतरनाक पहलू है वह है मध्यम वर्ग में इस खेल और रेस रोमांच की दीवानगी। कुछ सालों की ही बात है जब भारतीय मध्यवर्ग में क्रिकेट के प्रति दीवानगी को देखते हुए कॉरपोरेट सौदागरों ने भारत में व्यवसायिक क्रिकेट की शुरुआत की। आईपीएल शुरु होते ही क्रिकेट को तमाशा बनाने और मुनाफावसूली का धंधा शुरु हो गया। इस बार भी भारत को फॉर्मूला वन में वैश्विक पहचान दिलाने की साजिश के तहत पैसों का खेल खेला जा रहा है। इस पूरे आयोजन पर हजारों करोड़ रुपये का खर्च हो रहा है। कॉरपोरेट घराने इसी बहाने विदेशियों के बीच अपने ब्रांड की ताकत पेश करने की तैयारी कर रही हैं। प्रायोजकों ने खासतौर पर कॉरपोरेट घरानों के लिए विशेष बॉक्स का निर्माण कराया है। एक बॉक्स की कीमत तकरीबन 35 लाख से लेकर एक करोड़ रुपये तक की है। ऐसी खबरें भी रोज अखबारों और चैनलों में देखने को मिलती हैं कि इस आयाजन से पर्यटन उधोग में जबर्दस्त उछाल आया है। पांच सितारा होटलों की एडवांस बुकिंग हो चुकी है। यहां पर भी मुनाफा वसूली करने वाले वही धनकुबेर हैं। इससे आम भारतीय को आखिर क्या फायदा ? यहां तक कि देश का मध्यवर्ग जो आम भारतीय की श्रेणी से थोड़ा उपर उठने के लिए हमेशा लालायित रहता है उसे भी इस तरह के आयोजन से कोई फायदा नहीं पहुंचने वाला। ऐसी स्थिति में क्यों आम भारतीय इस आयोजन को राष्ट्रीय गौरव मानने की भूल करे।
                   

Tuesday, September 6, 2011

मनमोहन की बांग्लादेश यात्रा से सीमा विवाद सुलझने के आसार

प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की पहली बांग्लादेश यात्रा को लेकर दोनों मुल्कों के बीच संबंध और बेहतर होने के कयास लगाए जा रहे हैं। मनमोहन सिंह की इस यात्रा से पूर्वोत्तर राज्यों में उत्पन्न भूमि विवाद को लेकर पनपे दोनों देशों के खटास में भी मधुरता आने के संकेत हैं। इस यात्रा का लाभ पूर्वी राज्यों को तो मिलेगा ही साथ ही वहां जारी आतंकवाद पर भी अंकुश लगेगा।
शेख हसीना के प्रधानमंत्री बनने के बाद दोनों देशों के रिश्तों में सुधार के संकेत मिले हैं। भारत विरोधी गतिविधि के लिए बांग्लादेशी सरजमीं का इस्तेमाल करने वाले चरमपंथियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करके हसीना ने भारत को लेकर अपनी मैत्री नीति का मुजाहिरा किया है। इस कार्रवाई के मद्देनजर बांग्लादेश में आईएसआई और बांग्लादेशी विद्रोहियों द्वारा भारत के खिलाफ चल रही गतिविधियों पर बहुत हद तक अंकुश लगा है।
प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की इस दो दिवसीय यात्रा से दोनों देशों के द्विपक्षीय रिश्तों में नए आयाम जुड़ने की संभावना है। साथ ही इस यात्रा के दौरान बांग्लादेश की सीमा से जुड़े भारतीय राज्यों के मुख्यमंत्रियों को प्रधानमंत्री के प्रतिनिधिमंडल में शामिल किए जाने से यात्रा सकारात्मक रहने की उम्मीद है। भारत के पूर्वी राज्यों में शांति बहाली के लिए बांग्लादेश का सहयोग काफी महत्वपूर्ण है। भारत विभाजल के बाद पूर्वोत्तर के राज्य काफी उपेक्षा का शिकार रहे हैं। एक तरह से कहें तो भारत का यह हिस्सा शेष भारत से लगभग कटा हुआ है। बांग्लादेश के साथ संबंधों में सुधार का एक बड़ा फायदा पूर्वोत्तर के राज्यो को मिलेगा। संबंधों में सुधार आने पर दोनों देशों को व्यापारिक लाभ मिलेंगे। बांग्लादेश भारत के अलावा भारतीय भूमि का इस्तेमाल नेपाल के साथ व्यापारिक रिश्तों के लिए भी कर सकता है। इसका फायदा सीधे तौर पर पूर्वी राज्यों को मिलेगा।
इस यात्रा के दौरान जो सबसे बड़ा पक्ष है वह है सीमा विवाद। बांग्लादेश के साथ सीमा विवाद पूर्वोत्तर भारतीय राज्यों के साथ बेहतर संबंध स्थापित करने में बड़ी बाधा बना हुआ है। कई दफा इसी के परिणामस्वरूप सीमा पर गोलीबारी और तनाव देखने को मिलते हैं। कई भारतीय इलाके बांग्लादेशी सीमा से घिरे हुए है। तनाव की वजह से इन इलाकों के लोग बुनियादी सुविधाओं तक से महरूम हैं। कमोबेश यही हालात बांग्लादेशी सीमावर्ती इलाकों का भी है। दोनों मुल्कों के तकरीबन पचास हजार से ज्याद लोग भयावह स्थिति का सामना कर रहे हैं। हालांकि इस दिशा में एक अच्छी बात ये है कि करीब एक सौ बासठ विवादित क्षेत्रों की पहचान की जा चुकी है, जिनकी अदला-बदली होनी है। यदि इस तरह का कोई समझौता होता है तो निश्चित तौर पर भारत-बांग्लादेश के भौगोलिक नक्शे में कुछ बदलाव आएगा। नए सीमा के निर्धारण के बाद उन इलाकों के लोगों की नागरिकता स्वतः बदल जाएगी। समझोते के बाद सीमा पर बाड़ लगाना आसान हो जाएगा। दोनों देशों के बीच स्थायी शांति की दिशा में इस कदम को बेहतर माना जा सकता है।
हालांकि कुछ अलगाववादी ताकतें इसका राजनीतिक लाभ उठाने की जुगत में हैं। यदि भारत की जमीन बांग्लादेश को दी जा रही है तो भारत से ज्यादा जमीन मिल रही है। इसे व्यवहरिक नजरिए से देखने की जरूरत है। यह एक ऐतिहासिक मौका है। ऐसी स्थिति बार-बार नहीं आती। यह दुर्भाग्य ही था कि मुजीबुर्रहमान की हत्या के बाद बांग्लादेश भारत विरोधी कार्रवाईयों का केंद्र बना। जबकि भारत बांग्लादेश की मुक्ति का अहम वाहक रहा है।
मौजूदा बांग्लादेशी प्रधानमंत्री ने मैत्री की दिशा में कुछ बेहतर प्रयास जरूर किए हैं। शेख हसीना ने भारत विरोधियों के खिलाफ अपने कड़े तेवर दिखलाकर स्पष्ट कर दिया है कि उनका नजरिया मित्रता और व्यापार को बढ़ावा देना है। शेख हसीना द्वारा की जा रही पहल और प्रधानमंत्री की इस यात्रा से दोनों मुल्कों की सीमावर्ती इलाकों में शांति बहाली की प्रक्रिया को बल मिलेगा। जाहिर है इसका फायदा दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों पर भी पड़ेगा।

Sunday, August 7, 2011

यूरोप में बढ़ता दक्षिणपंथी चरमपंथ, वैश्विक शान्ति को दे रहा चुनौती.

नार्वे  के यूटोया द्वीप पर सत्ताधारी लेबर पार्टी की युवा इकाई की बैठक के दौरान वहां हुई भीषण गोलीबारी और प्रधानमन्त्री कार्यालय के पास हुए बम धमाके ने कट्टरपंथी ईसाई चरमपंथ के खुले तौर पर दुनिया के सामने आने का प्रमाण दिया है. हमलावर आंद्रे बेहरिंग ब्रिविक का वह बयान जिसमे उसने इस बर्बरता को ज़रूरी बताया है, निश्चित तौर पर यूरोपीय समाज में बढती धार्मिक असहिष्णुता और ईसाईयों में बढ़ते दक्षिणपंथी कट्टरपंथ, खासकर मुसलमानों के प्रति दुर्भावना की तरफ इशारा करता है. यह हमला ऐसे समय हुआ है जब पूरी दुनिया में सिर्फ इस्लामी चरमपंथ को ही वैश्विक अशांति के लिए  ज़िम्मेदार माना  जाता  है. 
 
           हमलावर   ब्रिविक ने अपने इकबाले जुर्म में साफतौर पर कहा कि वह इस बात को बर्दाश्त नहीं कर सकता कि पश्चिमी यूरोप का इस्लामीकरण हो जाये.  वह यूरोप को मुस्लिम नियंत्रण से मुक्त करना चाहता है. इस बारे में उसने अपनी डायरी में भी मुस्लिमों के प्रति घृणा भाव का ज़िक्र किया है और सरकार कि प्रवासी नीति पर तीखा प्रहार किया है. उसके कबूलनामे में गौर करने की बात यह है कि उसने यह स्वीकार कर कि इस वहशीपन को उसने अकेले ही अंजाम दिया है, लोगों का ज़ेहन भटकाने की कोशिश की है. उसके बचाव पक्ष में उतरे वकील ने भी उसे पागल करार देकर इस अपराध को एक व्यक्ति विशेष भर तक ही सीमित करने की कोशिश की है. नार्वे समेत पूरी दुनिया में इस जघन्य हत्या की निंदा की गयी है. लेकिन जो अहम् सवाल है वह ये है कि क्या ब्रिविक के कबूलनामे और उसके वकील की दलील को सही मानकर इस नृशंस हत्या को उस व्यक्ति के पागलपन तक ही सीमित मान लिया जाये ..? या फिर यूरोप में बढ़ते मुस्लिम दुर्भावना और दक्षिणपंथी चरमपंथ के सांगठनिक रूपों में पनपने की पड़ताल की जाये.

          पश्चिमी यूरोप का यह खूबसूरत मुल्क एक उदारवादी लोकतंत्र और शांति का पैरोकार होने वाले देश के रूप में अपनी पहचान रखता है,शांति का नोबेल पुरस्कार भी यहीं से दिया जाता है.  दुनिया के बाकी देशों की तुलना में यहाँ हत्याएं लगभग नगण्य होती हैं. देश में बहुसांस्कृतिक माहौल है. यहाँ की कुल आबादी तकरीबन 50 लाख है. यहाँ रहने वालों में विदेशी मूल के आप्रवासियों की संख्यां लगभग 13 प्रतिशत है. ईसाई बहुसंख्यक वाले इस देश में कई दूसरे धर्म के मानने वाले लोग भी वहां आकर बसे हैं जो कि अप्रवासी हैं. अप्रवासियों और विभिन्न धर्मों के होने की वजह से नार्वे के बहुसांस्कृतिक वातावरण में प्रगाढ़ता आयी है. इन प्रवासियों में भी ज्यादा तादाद मुस्लिमों की है जो पाकिस्तान, अरब, सोमालिया, टर्की, और अल्बानिया जैसे मुल्कों से आकर बसे हैं. हत्यारे के कबूलनामे से यह ज़ाहिर है कि यह हमला अप्रवासियों की आड़ में मुस्लिम अप्रवासी पर ही था. यह हमला ऐसे समय दरपेश आया है जब पूरी दुनिया में इस्लाम और मुस्लिमों के प्रति पहले से ही नफरत कि चिंगारी जल रही है. इस मज़हब और उसके मानने वाले लोग आतंक का पर्याय कहे जाने लगे हैं, और उन्हें सशंकित दृष्टि से देखा जाता है. ऐसे में अगर विश्व समुदाय ने संभलकर क़दम नहीं उठाये तो यूरोप में बढ़ता दक्षिणपंथी चरमपंथ उस चिंगारी में घी का काम कर सकता है.

              यह तो जगजाहिर है कि दुनियाभर में फैली अशांति और जगह-जगह हो रहे बड़े आतंकी हमले के पीछे कहीं न कहीं कोई वह व्यक्ति या संगठन है जिसका ताल्लुक इस्लाम से है. भले ही वैसे संगठन या व्यक्ति इस्लाम के पैगाम से कोसों दूर क्यों न हों उन्हें मुस्लिम मान लेना आम भूल है. दरअसल ये आम भूल भी नहीं कही जा सकती बल्कि यह इस्लाम के खिलाफ वैश्विक प्रोपेगेंडा का ही असर है. कई बार तो इन बड़े हमलों के बरअक्स छोटे-मोटे आपसी रंजिश से हुई खूंरेजी को भी लोकतंत्र के ठेकेदार अमेरिका और बाकी यूरोपीय मुल्क, इस्लामी चरमपंथ से जोड़ देते हैं. अफ़सोस तो इस बात पर होता है कि लोकतंत्र के उन ठेकेदारों के साथ-साथ वैसे प्रगतिशील और उदारवादी लोकतंत्र देश और उनके रहबर भी डॉलर और यूरो के बोझ तले  ऐसे प्रोपेगेंडा को सही मान लेने की हामी भर देते हैं जिसमें आतंकवाद और वैश्विक अशांति को इस्लामी चरमपंथ के इर्द-गिर्द तक ही सीमित कर दिया जाता है.

               ऐसा नहीं है कि पहली दफा आंद्रे बेहरिंग ब्रिविक ने इस्लाम और मुस्लिमों के प्रति घृणाभाव का ज़िक्र किया हो. ब्रिविक  इसके पहले भी कई बार दक्षिणपंथी प्रोग्रेस पार्टी के युवा सदस्य के तौर पर सार्वजनिक मंचों से  सांप्रदायिक भाषण दे चुका है. इसके अलावा भी कई  ऐसी वारदातें दृष्टिगोचर हो चुकी हैं जिनसे इस्लाम और मुस्लिमों के प्रति यूरोपीय नजरिया या यूँ कहें कि ईसाईयों के दक्षिणपंथी चरमपंथ के सबूत मिलते हैं. पिछले साल ही एक पादरी द्वारा मुस्लिमों के पवित्र ग्रन्थ 'कुरान' को जलाने की कोशिश की जा चुकी है. लेकिन हैरानी इस बात की है कि कभी भी ईसाईयों की इस्लाम के प्रति असहिष्णुता या ईसाईयों का दक्षिणपंथी चरमपंथ सांगठनिक रूप में दुनिया के सामने नहीं आया. हर बार ऐसी घटना को व्यक्ति विशेष का पागलपन कहकर लोगों का ज़ेहन बदल दिया जाता है और दुनिया की आँखों पर पर्दा डालने की कोशिश की जाती है. वैश्विक भाईचारे और मानवता प्रेमी बताने वाले उन बेचारे मुल्कों में भी इतना साहस नहीं कि इस तरह की घटना को सांगठनिक रूपों के परिणाम के तौर पर देखने की जुर्रत कर सकें.
 
             यूरोप में बढ़ते दक्षिणपंथी चरमपंथ के मद्देनज़र इस बात की ज़रुरत है कि विश्व समुदाय इस तरह की घटनाओं के मूल कारणों की पड़ताल करे. ऐसी घटनाओं को किसी व्यक्ति विशेष के वहशीपन और दरिंदगी के नतीजों के तौर पर मान लेने और घटना की निंदा मात्र कर देने के बजाये ऐसी साजिशों के सांगठनिक रूपों की शिनाख्त करने की ज़रुरत है. मौजूदा हालत पर अगर गंभीरता से गौर-फ़िक्र नहीं किया गया तो ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वालों का मनोबल और बढेगा जो कि वैश्विक शान्ति और भाईचारे के लिए खतरा बनकर सामने आ रहे हैं.

Monday, April 18, 2011

साइबर दुनिया के सामने वजूद खोती किताबें..........





”किताबों का जख़ीरा तुम्हें तलाशता है, यूं ही पढने ना सही, दर्शन के लिए आया तो करो ”
सूनी पड़ी लाइब्रेरी, पुस्तक मेले और प्रदर्शनी शायद अपनी बेबसी का इज़हार कुछ इस तरह ही किया करते हैं। सर्दियों का मौसम आते ही पुस्तक मेले और प्रदर्शनी की बयार सी आ जाती है। जगह-जगह इस तरह के पुस्तक मेले और प्रदर्शनी खूब देखने को मिलते हैं। दुनिया भर के पब्लिशर्स से पुस्तक मेला गुलज़ार रहता है।
दरअसल सर्दियों का मौसम घूमने टहलने के लिहाज़ से अच्छा माना जाता है शायद इसलिए ऐसे आयोजनों को इस सीज़न में रखने का मकसद ज़्यादा से ज़्यादा लोगों का रूख इस तरफ करना होता है। अगर इसका मकसद वाकई ज़्यादा से ज़्यादा लोगों का मेले और प्रदर्शनी की ओर ध्यान आकर्षित करना है तो पब्लिशर्स इस मामले में शत प्रतिशत अपने आप को कामयाब पाते होंगे, क्योंकि इस तरह की प्रदर्शनी और मेले अब फैमिली विकेन्ड की छुट्टी बिताने की जगह ले चुके हैं।
बड़े बुज़ुर्ग हमेशा कहते हैं कि किताबें सबसे अच्छी दोस्त होती हैं। आज के इस साइबर वर्ल्ड में शायद यह बात फीकी सी नज़र आती है। लाइब्रेरी और घर के आलमीरे में पड़ी किताबें धूल फांक रही हैं। लोगों के पढने की आदतों में बीते कुछ सालों के दौरान तेज़ी से गिरावट आई है। इस सब के पीछे जो एक वजह नज़र आती ह,ै वह है साइबर दुनिया का तेज़ी से हो रहा विस्तार। आज की दुनिया के लोगों के पास बहुत समयाभाव है। लोग इतनी जल्दी में हैं कि एसएमएस पढने तक में परेशानी महसूस करते हैं, अब तो मोबाइल पर मैसेज लिखने की एक अतिसूक्ष्म शैली का विकास हो चुका है।

हाल ही में आईआईएमसी में इसी तरह की पुस्तक प्रदर्शनी लगी थी। मीडिया संस्थान होने की वजह से यहां पर ज़्यादातर किताबें मीडिया से ही संबंधित थीं। कॉलेज के बच्चों को इस प्रदर्शनी को देखने और इस पर एक फीचर लिखने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई। छात्रों का पुस्तकों की ओर अचानक से रूख करना और माथे पर आया शिकन उनके असाइनमेंट के बोझ तले दबे होने का एहसास करा रहा था, न कि किताबों के प्रति उनके प्रेम को दर्शा रहा था।  आईआईएमसी की लाइब्रेरी काफी  समृद्ध  है लेकिन ज़्यादातर वक्त सूनी पड़ी रहती है। आजकल पढाने की एक ऐसी कला का विकास हुआ है जहां किताबों की जगह पीपीटी (पावर प्वाइंट) ने ले रखी है। ज़्यादातर अध्यापक भी अब इसी शैली का प्रयोग करते नज़र आते हैं। ज़ाहिर है छात्र भी इसी तरीके को अपनाएंगे। किताबों का महंगा होना भी एक बड़ा कारण है। जो सामग्री आप 40-50 रूपये में इंटरनेट पर पाते हैं उन्हीं चीज़ों के लिए आपको किताबों के उपर हजारों ख़र्च करने पड़ते हैं।
किताबों से लोगों की दूरियां दिन ब दिन बढती ही जा रहीं हैं। अब तो संकट यह खड़ा हो गया है कि आखिर कैसे लोगों में किताब पढने की आदत का विकास किया जाए। थर्ड जेनेरेशन के इस दौर में यह एक मुश्किल चुनौती के रूप में सामने आने वाली है !!!


सोशल नेटवर्किंग : वैकल्पिक मीडिया का नया चेहरा


2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला हो या  फिर मध्य-पूर्व में शासकों की तानाशाही अब कोई भी जानकारी पोशीदा नहीं होती. मुख्यधारा की पत्रकारिता भले ही इन घोटालों, अराजकता और तानाशाही को छुपाने की लाख कोशिश करे लेकिन वैकल्पिक माध्यमों ने इसका पर्दाफाश करने में अहम् भूमिका निभायी है. वैसे तो वैकल्पिक माध्यम कोई नई चीज़ नहीं पर तकनीक के विस्तार और इंटरनेट की दुनिया ने सूचनाओं की पारदर्शिता को और गति दी है.
आर्थिक उदारीकरण के बाद पत्रकारिता के चरित्र में व्यापक बदलाव देखने को मिले. पत्रकारिता शब्द धीरे-धीरे गायब होता गया. मिशन जैसी कोई चीज़ नहीं रह गई. पत्रकारिता की जगह मीडिया ने ले ली जिस पर कारपोरेटीकरण की पूरी मुहर लग चुकी थी. अन्य व्यवसायों की तरह मीडिया भी एक व्यवसाय मात्र रह गया, जहाँ पत्रकारों की जगह मीडिया प्रोफेशनल्स ने ले ली. अखबार एक प्रोडक्ट बन चुका था. अखबार मालिकों ने अखबार को प्रोडक्ट के रूप में पेश करना शुरू किया.
इसी दरम्यान सूचना क्रांति का दौर शुरू हुआ. संचार के नए-नए माध्यम प्रकाश में आए जहाँ हर किसी को अभिव्यक्ति का एक प्लेटफ़ॉर्म मिला. नए-नए वेब पोर्टल्स का चलन शुरू हुआ. ब्लॉगिंग की शुरुआत के बाद इस दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिले. ब्लॉगिंग मुफ्त होने की वजह से ज्यादा से ज्यादा लोग इस तरफ आकर्षित हुए. देश दुनिया से जुड़े कई मुद्दे, घटनाएं जिन्हें मुख्यधारा में जगह नहीं मिलती थी, ब्लॉग पोस्ट के माध्यम से लोगों तक पहुँचने लगीं.
इसी कड़ी में सोशल नेटवर्किंग साईट के आने के बाद सूचनाओं के प्रसार का और विस्तार हुआ. ऑरकुट, फेसबुक, ट्विटर आदि सोशल नेटवर्किंग साईट काफी लोकप्रिय साबित हुईं. इस तरह के साईट को एक बड़े बदलाव के रूप में इस तरह भी देखा जा सकता है कि इसने युवाओं को काफी प्रभावित किया और उनमे एक नयी चेतना का विकास हुआ. फेसबुक, ट्विटर युवाओं के लिए सिर्फ चैटिंग का माध्यम नहीं रह गया. देश दुनिया से जुड़े आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक पहलु पर भी बहस होने लगी. राजनैतिक रूप से शिथिल हो चुकी आज कि युवा पीढ़ी में भी चेतना का विकास हुआ. इसका ताज़ा उदाहरण मिस्र में हुई क्रांति और मध्य-पूर्व में तानाशाही के खिलाफ आवाज़ के रूप में सामने आया. मिस्र में होस्नी मुबारक कि विदाई में फेसबुक कि अहम् भूमिका रही. फेसबुक के ज़रिए ही युवाओं ने होस्नी के खिलाफ मोर्चा खोला और जनता सड़क पर आ गई. 
इस कड़ी में हालिया उदाहरण भारत का भी लिया जा सकता है. भ्रष्टाचार के खिलाफ इण्डिया अगेंस्ट करप्शन मुहीम को लेकर फेसबुक और तमाम तरह के सोशल मीडिया के माध्यम से युवाओं में चेतना लायी गई. नतीजा यह हुआ कि मुख्यधारा कि मीडिया में भी अन्ना हजारे के जनलोकपाल विधेयक के लिए किये गए अनशन को व्यापक कवरेज मिली. इससे पहले तक  भ्रष्टाचार का मुद्दा या तो चलती फिरती शक्ल में उठाया गया या फिर इस मुद्दे को टीआरपी के अनुकूल नहीं होने कि वजह से मीडिया ने हमेशा ही तीसरे दर्जे पर रखा.
 विकिलीक्स के सनसनीखेज़ खुलासे के बाद तो जैसे तूफ़ान ही उठ खड़ा हुआ. उच्चस्तरीय राजनैतिक भ्रष्टाचार कि खबरें पहले विकिलीक्स, यू-ट्यूब जैसे वैकल्पिक माध्यम के ज़रिए ही लोगों तक पहुँचीं. इसका असर यह हुआ कि मेनस्ट्रीम मीडिया को भी वैकल्पिक माध्यमों का ही सहारा लेना पड़ा.


सोशल मीडिया कि ताकत दिन-ब-दिन बढती जा रही है और इसका असर  बहुत ही  व्यापक हो रहा है. हाल के वर्षों में वैकल्पिक माध्यमों के प्रसार ने जिस तरह मुख्यधारा की मीडिया को चुनौती दी है और फेसबुक, ट्विटर के ज़रिए लगातार हो रही सामाजिक, राजनैतिक बहसों को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि इस तरह के माध्यम वैकल्पिक मीडिया का का नया चेहरा बनता जा रहा है.....
   

Tuesday, March 22, 2011

एक दोस्त हुआ करती थी......

सालों पहले मेरी एक दोस्त हुआ करती थी
मुझसे जब मिलती, हम-आगोश हुआ करती थी
उसकी हर बात पे मैं तंज़ किया करता था
मेरी हर बार वो तारीफ किया करती थी
कितनी नाराज़ ही हो क्यों न वो मुझसे लेकिन
मेरी ही ग़ज़लों से मसरूर हुआ करती थी
मेरे माथे पे शिकन जो नज़र आती उसको
हौसला देती, फिकरमंद हुआ करती थी

आज वो है तो सही लेकिन मेरे साथ नहीं
मुझको दिखती भी है, पर उससे कोई बात नहीं
बात तो दूर है, अब उससे मुलाक़ात नहीं
ग़ज़ल तो सुनती है, पर मेरे वो नग़मात नहीं


मैं नहीं जानता आख़िर उसे हुआ क्या है
और ये सोचता हूँ मुझसे हुई ख़ता क्या है

अब तो ये हाल है के तनहा जिए जाता हूँ
भीड़ में होता हूँ, खुद को अकेला पाता हूँ
मेरी ग़ज़लें, अब खुद को ही सुनाता हूँ
बस एक उम्मीद लिए अब मैं चला जाता हूँ

के एक दिन आएगा, खुशियों की बहार आएगी
पास आएगी वो, और चुपके से सदा देगी
मेरे अश्आर सुनेगी, और मुस्कुरा देगी
मैं उसपे तंज़ करूँगा, मुझे दुआ देगी
मेरी तारीफ़ करेगी, गले लगा लेगी....
मेरी तारीफ़ करेगी, गले लगा लेगी....

Tuesday, February 15, 2011

वैलेंटाइन डे: 24×7 वाली ज़िंदगी में प्यार के लिए मुक़र्रर दिन



ज़िंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं, मैं तो मर के भी मेरी जान तुझे चाहूंगा........... हर साल फरवरी का महीना आते ही ज़्यादातर युवाओं की ज़बान पर यह धुन होती है। कोई अपनी दीवानगी की सारी हद तोड़ने की जि़द में है तो किसी को फिर से शर्म-ओ-हया की चादर ओढ़े खाली हाथ लौटने का डर सता रहा है। कोई दोस्तों से लगी शर्त जीतना चाहता है तो कोई अपना सब कुछ हार के भी किसी को पाने की तमन्ना लिए बैठा है। इन सारी दीवानगी की हद के पीछे एक जादुई वाक्य है-”आई लव यू”। यह अल्फाज़ सुनने में भले ही बहुत आसान लगे पर कहना है उतना ही मुश्किल। यह ऐसे है जैसे साहिल समंदर के क़रीब होते हुए भी अपनी मौजूदगी का एहसास दिलाने की कोशिश कर रहा हो।
14 फरवरी यानि वैलेन्टाइन डे यानि प्यार करने का दिन। आज की इस दौड़ती भागती दुनिया में हमारे पास वक़्त की इतनी कमी है कि हमने प्यार मुहब्बत के लिए भी एक ख़ास दिन मुक़र्रर कर रखा है। प्यार एक ख़ूबसूरत एहसास होता है, जैसी बात आज के समय में आउटडेटेड सी हो गई है। आज प्यार जताने की ज़रूरत महसूस की जाने लगी है। प्यार की बुनियाद वैलेन्टाइन डे पर किए जाने वाले गिफ्ट्स के आदान प्रदान के इर्द-गिर्द आकर टिक गई है। गिफ्ट्स जितने महंगे और आकर्षक होंगे प्यार में उतना ही टिकाऊपन आएगा।
फरवरी का दूसरा हफ्ता आते ही वैलेन्टाइन वीक की शुरूआत हो जाती है। रोज़ डे, प्रोपोज़ डे, चॉकलेट डे, न जाने कौन-कौन से डे सेलिब्रेट किए जाते हैं। बाज़ारवाद इस क़दर हावी है कि सब अपने प्रॉडक्ट को खपाने की जुगत में लगे हैं। वैलेन्टाइन डे का कल्चर अब सिर्फ बड़े शहरों की बात नहीं रह गई है। बाज़ार ने इसे मेट्रो और मॉल के साथ साथ गांव-देहात की दुकान तक पहुंचा दिया है। अब तो समस्तीपुर, बिहार के एक छोटे से कस्बे में रहने वाला रमेश भी वैलेन्टाइन डे की बात करने लगा है। रमेश बहुत मुश्किल से यह बता पाता है कि युवा दिवस कब आता है लेकिन यह बताने में उसे कोई देर नहीं लगती कि 7 फरवरी रोज़ डे है।
प्यार अब इतना टेंपरेरी हो चुका है कि कब इसे बदलने की नौबत आ जाए पता नहीं होता। महानगरों में तो प्यार के अलग-अलग टेस्ट देखने को मिलते हैं। दिल्ली में रहने वाले अनूप इतने दिल फेंक हैं कि इस वैलेन्टाइन वह चौथी लड़की पर उस जादुई अल्फाज़ का इस्तेमाल करने जा रहे हैं। दक्षिणी दिल्ली में रहने वाले मनीष की तो कहानी ही कुछ अलग है। मनीष वंदना से बहुत प्यार करते हैं। वंदना का दिल महंगी ज्वेलरी के लिए धड़कता है। अब मनीष अपने प्यार को हासिल करने के लिए ज्वेलरी का सहारा लेने की सोच रहे हैं। आज के ज़्यादातर युवा प्यार को पाने के लिए इसी प्रपंच का इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन इस सब से परे कुछ ऐसे भी दीवाने हैं जो प्यार को एक ख़ूबसूरत एहसास भर ही मानते हैं। दिल्ली के जामिया विश्वविधालय में पढ़ने वाले इमरान का तो अंदाज़ ही जुदा है। वो पिछले कई सालों से दरख़्शां को चाहते हैं। इमरान आज तक इज़हार-ए-तमन्ना नहीं कर पाये हैं। उनका मानना है कि प्यार इतना कमज़ोर नहीं होता कि चॉकलेट और दूसरे गिफ्ट्स का वो मोहताज हो। इमरान कहते हैं कि मैं शायद कभी अपनी मुहब्बत का इज़हार न कर पाऊं लेकिन अपनी तरफ से ज़िन्दगी  भर उसे उतनी ही शिद्दत से चाहता रहूंगा जितना आज चाहता हूं।
वैलेन्टाइन डे हर साल आएगा। नए-नए वादे किए जाएंगे। उन वादों को पूरा करने के लिए बाज़ार भी नया आईडिया लाएगा। अभी तो सिर्फ वैलेन्टाइन वीक सेलिब्रेट किए जाते हैं। वो दिन भी दूर नहीं जब वैलेन्टाइन मंथ की शुरूआत हो जाएगी। सवाल यह है कि क्या बाज़ारवाद का असर इमरान जैसे गिने-चुने लोगों पर भी पड़ेगा जिनके लिए वैलेन्टाइन डे ही एकमात्र खास दिन नहीं बल्कि हर पल हर लम्हा वैलेन्टाइन होता है।