Sunday, August 7, 2011

यूरोप में बढ़ता दक्षिणपंथी चरमपंथ, वैश्विक शान्ति को दे रहा चुनौती.

नार्वे  के यूटोया द्वीप पर सत्ताधारी लेबर पार्टी की युवा इकाई की बैठक के दौरान वहां हुई भीषण गोलीबारी और प्रधानमन्त्री कार्यालय के पास हुए बम धमाके ने कट्टरपंथी ईसाई चरमपंथ के खुले तौर पर दुनिया के सामने आने का प्रमाण दिया है. हमलावर आंद्रे बेहरिंग ब्रिविक का वह बयान जिसमे उसने इस बर्बरता को ज़रूरी बताया है, निश्चित तौर पर यूरोपीय समाज में बढती धार्मिक असहिष्णुता और ईसाईयों में बढ़ते दक्षिणपंथी कट्टरपंथ, खासकर मुसलमानों के प्रति दुर्भावना की तरफ इशारा करता है. यह हमला ऐसे समय हुआ है जब पूरी दुनिया में सिर्फ इस्लामी चरमपंथ को ही वैश्विक अशांति के लिए  ज़िम्मेदार माना  जाता  है. 
 
           हमलावर   ब्रिविक ने अपने इकबाले जुर्म में साफतौर पर कहा कि वह इस बात को बर्दाश्त नहीं कर सकता कि पश्चिमी यूरोप का इस्लामीकरण हो जाये.  वह यूरोप को मुस्लिम नियंत्रण से मुक्त करना चाहता है. इस बारे में उसने अपनी डायरी में भी मुस्लिमों के प्रति घृणा भाव का ज़िक्र किया है और सरकार कि प्रवासी नीति पर तीखा प्रहार किया है. उसके कबूलनामे में गौर करने की बात यह है कि उसने यह स्वीकार कर कि इस वहशीपन को उसने अकेले ही अंजाम दिया है, लोगों का ज़ेहन भटकाने की कोशिश की है. उसके बचाव पक्ष में उतरे वकील ने भी उसे पागल करार देकर इस अपराध को एक व्यक्ति विशेष भर तक ही सीमित करने की कोशिश की है. नार्वे समेत पूरी दुनिया में इस जघन्य हत्या की निंदा की गयी है. लेकिन जो अहम् सवाल है वह ये है कि क्या ब्रिविक के कबूलनामे और उसके वकील की दलील को सही मानकर इस नृशंस हत्या को उस व्यक्ति के पागलपन तक ही सीमित मान लिया जाये ..? या फिर यूरोप में बढ़ते मुस्लिम दुर्भावना और दक्षिणपंथी चरमपंथ के सांगठनिक रूपों में पनपने की पड़ताल की जाये.

          पश्चिमी यूरोप का यह खूबसूरत मुल्क एक उदारवादी लोकतंत्र और शांति का पैरोकार होने वाले देश के रूप में अपनी पहचान रखता है,शांति का नोबेल पुरस्कार भी यहीं से दिया जाता है.  दुनिया के बाकी देशों की तुलना में यहाँ हत्याएं लगभग नगण्य होती हैं. देश में बहुसांस्कृतिक माहौल है. यहाँ की कुल आबादी तकरीबन 50 लाख है. यहाँ रहने वालों में विदेशी मूल के आप्रवासियों की संख्यां लगभग 13 प्रतिशत है. ईसाई बहुसंख्यक वाले इस देश में कई दूसरे धर्म के मानने वाले लोग भी वहां आकर बसे हैं जो कि अप्रवासी हैं. अप्रवासियों और विभिन्न धर्मों के होने की वजह से नार्वे के बहुसांस्कृतिक वातावरण में प्रगाढ़ता आयी है. इन प्रवासियों में भी ज्यादा तादाद मुस्लिमों की है जो पाकिस्तान, अरब, सोमालिया, टर्की, और अल्बानिया जैसे मुल्कों से आकर बसे हैं. हत्यारे के कबूलनामे से यह ज़ाहिर है कि यह हमला अप्रवासियों की आड़ में मुस्लिम अप्रवासी पर ही था. यह हमला ऐसे समय दरपेश आया है जब पूरी दुनिया में इस्लाम और मुस्लिमों के प्रति पहले से ही नफरत कि चिंगारी जल रही है. इस मज़हब और उसके मानने वाले लोग आतंक का पर्याय कहे जाने लगे हैं, और उन्हें सशंकित दृष्टि से देखा जाता है. ऐसे में अगर विश्व समुदाय ने संभलकर क़दम नहीं उठाये तो यूरोप में बढ़ता दक्षिणपंथी चरमपंथ उस चिंगारी में घी का काम कर सकता है.

              यह तो जगजाहिर है कि दुनियाभर में फैली अशांति और जगह-जगह हो रहे बड़े आतंकी हमले के पीछे कहीं न कहीं कोई वह व्यक्ति या संगठन है जिसका ताल्लुक इस्लाम से है. भले ही वैसे संगठन या व्यक्ति इस्लाम के पैगाम से कोसों दूर क्यों न हों उन्हें मुस्लिम मान लेना आम भूल है. दरअसल ये आम भूल भी नहीं कही जा सकती बल्कि यह इस्लाम के खिलाफ वैश्विक प्रोपेगेंडा का ही असर है. कई बार तो इन बड़े हमलों के बरअक्स छोटे-मोटे आपसी रंजिश से हुई खूंरेजी को भी लोकतंत्र के ठेकेदार अमेरिका और बाकी यूरोपीय मुल्क, इस्लामी चरमपंथ से जोड़ देते हैं. अफ़सोस तो इस बात पर होता है कि लोकतंत्र के उन ठेकेदारों के साथ-साथ वैसे प्रगतिशील और उदारवादी लोकतंत्र देश और उनके रहबर भी डॉलर और यूरो के बोझ तले  ऐसे प्रोपेगेंडा को सही मान लेने की हामी भर देते हैं जिसमें आतंकवाद और वैश्विक अशांति को इस्लामी चरमपंथ के इर्द-गिर्द तक ही सीमित कर दिया जाता है.

               ऐसा नहीं है कि पहली दफा आंद्रे बेहरिंग ब्रिविक ने इस्लाम और मुस्लिमों के प्रति घृणाभाव का ज़िक्र किया हो. ब्रिविक  इसके पहले भी कई बार दक्षिणपंथी प्रोग्रेस पार्टी के युवा सदस्य के तौर पर सार्वजनिक मंचों से  सांप्रदायिक भाषण दे चुका है. इसके अलावा भी कई  ऐसी वारदातें दृष्टिगोचर हो चुकी हैं जिनसे इस्लाम और मुस्लिमों के प्रति यूरोपीय नजरिया या यूँ कहें कि ईसाईयों के दक्षिणपंथी चरमपंथ के सबूत मिलते हैं. पिछले साल ही एक पादरी द्वारा मुस्लिमों के पवित्र ग्रन्थ 'कुरान' को जलाने की कोशिश की जा चुकी है. लेकिन हैरानी इस बात की है कि कभी भी ईसाईयों की इस्लाम के प्रति असहिष्णुता या ईसाईयों का दक्षिणपंथी चरमपंथ सांगठनिक रूप में दुनिया के सामने नहीं आया. हर बार ऐसी घटना को व्यक्ति विशेष का पागलपन कहकर लोगों का ज़ेहन बदल दिया जाता है और दुनिया की आँखों पर पर्दा डालने की कोशिश की जाती है. वैश्विक भाईचारे और मानवता प्रेमी बताने वाले उन बेचारे मुल्कों में भी इतना साहस नहीं कि इस तरह की घटना को सांगठनिक रूपों के परिणाम के तौर पर देखने की जुर्रत कर सकें.
 
             यूरोप में बढ़ते दक्षिणपंथी चरमपंथ के मद्देनज़र इस बात की ज़रुरत है कि विश्व समुदाय इस तरह की घटनाओं के मूल कारणों की पड़ताल करे. ऐसी घटनाओं को किसी व्यक्ति विशेष के वहशीपन और दरिंदगी के नतीजों के तौर पर मान लेने और घटना की निंदा मात्र कर देने के बजाये ऐसी साजिशों के सांगठनिक रूपों की शिनाख्त करने की ज़रुरत है. मौजूदा हालत पर अगर गंभीरता से गौर-फ़िक्र नहीं किया गया तो ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वालों का मनोबल और बढेगा जो कि वैश्विक शान्ति और भाईचारे के लिए खतरा बनकर सामने आ रहे हैं.