हाल के दिनों में राजनीतिज्ञों और बड़ी शख्सियतों पर हमले की एक के बाद एक कई वारदातें सामनें आई हैं...ये पहली बार नहीं कि किसी नेता को किसी व्यक्ति के गुस्से का शिकार होना पड़ा है... इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण पर हमला हुआ....कई मंत्रियों पर हमला हो चुका है..गृह मंत्री पी चिदम्बरम तक हमले के शिकार वाले फेहरिस्त में शुमार हो चुके हैं...हमले के बाद लोग अलग अलग तर्कों के साथ बयान देते नज़र आते हैं...शरद पवार पर किये गए हमले के बाद कई राजनीतिज्ञों और नेताओं ने इसे सुरक्षा में सेंध बतलाया तो कईयों ने एक तरह से हमलावर का बचाव करने वाले अंदाज़ में इसे सरकार और शासन के प्रति गुस्से और उबाल का परिणाम बताया....लेकिन अगर इस तर्क को माने कि लोग महंगाई और भ्रष्टाचार से त्रस्त हो चुके हैं और उनके पास कोई चारा नहीं...क्या वाकई इस तर्क को जायज़ और वाजिब ठहराया जा सकता है..? क्या हमारा विश्वास कानून व्यवस्था और संवैधानिक ढांचे से उठ चुका है...? जब कोई पुलिसवाला बदसुलूकी करता है तो हम कानून का हवाला देकर उसे कानून की अवहेलना बताते हैं....लेकिन क्या कानून व्यवस्था और नैतिकता की ज़िम्मेदारी सिर्फ पुलिस महकमे और प्रशासनिक तबको पर ही है.....क्या हमारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं बनती..... हमारी सहनशीलता का स्तर इतना गिर चुका है कि हम लात, घूसों और थप्पड़ के नीचे बात नहीं कर सकते..? क्या आज भगत सिंह और उन जैसे क्रांतिकारी इतने सस्ते हो गए हैं कोई भी राह चलता हुआ किसी को थप्पड़ मार दे और खुद को क्रांतिकारी साबित कर भगत सिंह के उसूलों को ठेस पहुंचाए....इन सब घटनाओं के दरम्यान गांधीवादी अन्ना हजारे की शुरूआती प्रतिक्रिया काफी चौंकाने वाली रही...अन्ना ने शरद पवार को थप्पड़ लगने वाली घटना पर तुरंत ही व्यंग्य वाले अंदाज़ में कहा "बस एक ही मारा..." हालांकि इसके बाद अन्ना अपनी इस प्रतिक्रिया पर सफाई देते फिर रहे हैं कि मेरा मतलब वो नहीं था...लेकिन अन्ना ने जो कहा और जिस अंदाज़ में कहा वो टीवी पर बैठे दर्शक पूरे गौर से देख रहे थे...कुछ बुद्धिजीवियों ने तो बिना सोचे समझे यह कह दिया कि लोगों का गुस्सा तो एक दिन फूटना ही था...लेकिन क्या इस गुस्से की परिणति लात, घूसों और मारपीट के रूप में स्वीकार करने के लिए आम अवाम तैयार है...संभवतः इसका जवाब नहीं में ही होगा...इस तरह की चीज़ों को कतई जायज़ नहीं ठहराया जा सकता...यह वाकई खतरनाक संकेत है...चंद लोगों के असहिष्णु क़दम को किसी कीमत पर क्रान्ति की शुरुआत कहना मूर्खता होगा...अगर हम सत्ता और शासन के खिलाफ मध्य-पूर्व के देशों में पैदा हुए हालत और लोगों के विरोध की प्रकृति पर गौर करेंगे तो हम पाएंगे कि वहां भी लोगों ने तबतक हिंसक रूप नहीं अपनाया जबतक सत्ता की तरफ से पहले कार्रवाई नहीं हुई...इसके बाद हम नतीजे पर पहुंचेंगे तो पता चलेगा कि अभी भारत की जनता मानसिक रूप से किसी भी परिवर्तन के लिए तैयार ही नहीं है सिवाय खुद को भगत सिंह और क्रांतिकारी बताने के..
