Wednesday, September 7, 2011

रेस रोमांच की भूल-भुलैया में ले जाने वाला फॉर्मूला

भारत में फॉर्मूला वन रेस की तैयारियां जोर शोर से चल रही है। ग्रेटर नोएडा के रेसिंग ट्रैक को रेसरों के लिए तैयार किया जा रहा है। टिकटों की बिक्री के आंकड़ों को देखकर ऐसा लग रहा है कि भारत के लोग रेसिंग को लेकर कितने क्रेजी हैं। टीवी चैनलों से लेकर एफएम रेडियो स्टेशनों तक हर जगह खबरें छाई हुई हैं, बल्कि यूं कहना ज्यादा बेहतर होगा कि इन माध्यमों के जरिए इमर्जिंग इंडिया और भारत के आर्थिक महाशक्ति बनने का विज्ञापन पेश किया जा रहा है।
फॉर्मूला वन रेस भारत में उस वक्त अखबारों और टेलीविजन चैनलों की सुर्खियां बना जब एक भारतीय रेसर ने फॉर्मूला वन रेस में पदार्पण किया। पैसों से सराबोर इस खेल में एक भारतीय के प्रतिनिधित्व की खबर से तो ऐसा लगा जैसे हमने दुनिया ही जीत ली हो। नारायण कार्तिकेयन ने ऑस्ट्रेलियन ग्रैंड प्रिक्स 2005 से अपने करियर की शुरुआत की। इसके बाद अचानक से एक शौकीन भारतीय कॉरपोरेट विजय माल्या की नजर इस ड्राइवर पर पड़ी तो उसने फॉर्मूला वन में फोर्स इंडिया नाम से एक टीम लॉंच कर डाली और इस तरह फॉर्मूला वन में भारतीय प्रतिनिधित्व के नाम पर भारतीय लोगों के इमोशनल अत्याचार का प्रयास शुरु हुआ।
हालिया कुछ सालों में दुनिया की नजर में भारत आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरकर सामने आया। ऐसे में भारत में इस खेल का आयोजन भारतीय कॉरपोरेट घरानों के लिए इज्जत का सवाल बन गया। कॉरपोरेट समूहों को इसमें सफलता भी मिली और भारत में इस खेल के आयोजन को हरी झंडी भी मिल गई। लेकिन भारत की वैश्विक इज्जत बढ़ाने वाले इन कॉरपोरेट समूहों ने अपनी बुद्धिमता का प्रदर्शन करते हुए एक चूक कर ही डाली। दरअसल इस महंगे खेल का आयोजन भारत के किसी हाईटेक माने जाने वाले शहर मसलन बंगलुरू या हैदराबाद में न करवा कर इसकी मेजबानी ऐसे राज्य में कराए जाने का फैसला लिया गया जो खुद ही अभावग्रस्त और पिछड़ेपन से निकलने का रास्ता तलाश रहा है। खासकर इस खेल का आयोजन स्थल बहुत ही दिलचस्प है। उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा को इसकी मेजबानी सौंपी गई संभवतः इसलिए कि यह राष्ट्रीय राजधानी से सटा होने के साथ-साथ प्रदेश के दूसरे इलाकों की अपेक्षा ज्यादा विकसित है। दुर्भाग्य से ग्रेटर नोएडा हाल के दिनों में ऐसे रूप में पेश हुआ जिसने सरकार और कॉरपोरेट माफियाओं जैसे बिल्डरों, रीयल एस्टेट मालिकों द्वारा गरीब किसानों के शोषण और उन्हें सड़क का रास्ता दिखाने की पोल खोल दी। एक तरफ फॉर्मूला वन के लिए चिकने रोड और वर्ल्ड क्लास रेसिंग ट्रैक को तैयार किया गया तो दूसरी तरफ किसानों को सड़कों पर ला खड़ा कर उनपर अत्याचार किए गए। जब निहत्थे किसानों पर बर्बर कार्रवाई की गई उस वक्त इन कॉरपोरेट घरानों को भारतीय इज्जत की परवाह नहीं थी। दरअसल उन किसानों की परवाह की भी क्यों जाए आखिर इनसे धनकुबेरों को क्या फायदा पहुंचने वाला।
इस आयोजन के पीछे जो एक खतरनाक पहलू है वह है मध्यम वर्ग में इस खेल और रेस रोमांच की दीवानगी। कुछ सालों की ही बात है जब भारतीय मध्यवर्ग में क्रिकेट के प्रति दीवानगी को देखते हुए कॉरपोरेट सौदागरों ने भारत में व्यवसायिक क्रिकेट की शुरुआत की। आईपीएल शुरु होते ही क्रिकेट को तमाशा बनाने और मुनाफावसूली का धंधा शुरु हो गया। इस बार भी भारत को फॉर्मूला वन में वैश्विक पहचान दिलाने की साजिश के तहत पैसों का खेल खेला जा रहा है। इस पूरे आयोजन पर हजारों करोड़ रुपये का खर्च हो रहा है। कॉरपोरेट घराने इसी बहाने विदेशियों के बीच अपने ब्रांड की ताकत पेश करने की तैयारी कर रही हैं। प्रायोजकों ने खासतौर पर कॉरपोरेट घरानों के लिए विशेष बॉक्स का निर्माण कराया है। एक बॉक्स की कीमत तकरीबन 35 लाख से लेकर एक करोड़ रुपये तक की है। ऐसी खबरें भी रोज अखबारों और चैनलों में देखने को मिलती हैं कि इस आयाजन से पर्यटन उधोग में जबर्दस्त उछाल आया है। पांच सितारा होटलों की एडवांस बुकिंग हो चुकी है। यहां पर भी मुनाफा वसूली करने वाले वही धनकुबेर हैं। इससे आम भारतीय को आखिर क्या फायदा ? यहां तक कि देश का मध्यवर्ग जो आम भारतीय की श्रेणी से थोड़ा उपर उठने के लिए हमेशा लालायित रहता है उसे भी इस तरह के आयोजन से कोई फायदा नहीं पहुंचने वाला। ऐसी स्थिति में क्यों आम भारतीय इस आयोजन को राष्ट्रीय गौरव मानने की भूल करे।
                   

Tuesday, September 6, 2011

मनमोहन की बांग्लादेश यात्रा से सीमा विवाद सुलझने के आसार

प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की पहली बांग्लादेश यात्रा को लेकर दोनों मुल्कों के बीच संबंध और बेहतर होने के कयास लगाए जा रहे हैं। मनमोहन सिंह की इस यात्रा से पूर्वोत्तर राज्यों में उत्पन्न भूमि विवाद को लेकर पनपे दोनों देशों के खटास में भी मधुरता आने के संकेत हैं। इस यात्रा का लाभ पूर्वी राज्यों को तो मिलेगा ही साथ ही वहां जारी आतंकवाद पर भी अंकुश लगेगा।
शेख हसीना के प्रधानमंत्री बनने के बाद दोनों देशों के रिश्तों में सुधार के संकेत मिले हैं। भारत विरोधी गतिविधि के लिए बांग्लादेशी सरजमीं का इस्तेमाल करने वाले चरमपंथियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करके हसीना ने भारत को लेकर अपनी मैत्री नीति का मुजाहिरा किया है। इस कार्रवाई के मद्देनजर बांग्लादेश में आईएसआई और बांग्लादेशी विद्रोहियों द्वारा भारत के खिलाफ चल रही गतिविधियों पर बहुत हद तक अंकुश लगा है।
प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की इस दो दिवसीय यात्रा से दोनों देशों के द्विपक्षीय रिश्तों में नए आयाम जुड़ने की संभावना है। साथ ही इस यात्रा के दौरान बांग्लादेश की सीमा से जुड़े भारतीय राज्यों के मुख्यमंत्रियों को प्रधानमंत्री के प्रतिनिधिमंडल में शामिल किए जाने से यात्रा सकारात्मक रहने की उम्मीद है। भारत के पूर्वी राज्यों में शांति बहाली के लिए बांग्लादेश का सहयोग काफी महत्वपूर्ण है। भारत विभाजल के बाद पूर्वोत्तर के राज्य काफी उपेक्षा का शिकार रहे हैं। एक तरह से कहें तो भारत का यह हिस्सा शेष भारत से लगभग कटा हुआ है। बांग्लादेश के साथ संबंधों में सुधार का एक बड़ा फायदा पूर्वोत्तर के राज्यो को मिलेगा। संबंधों में सुधार आने पर दोनों देशों को व्यापारिक लाभ मिलेंगे। बांग्लादेश भारत के अलावा भारतीय भूमि का इस्तेमाल नेपाल के साथ व्यापारिक रिश्तों के लिए भी कर सकता है। इसका फायदा सीधे तौर पर पूर्वी राज्यों को मिलेगा।
इस यात्रा के दौरान जो सबसे बड़ा पक्ष है वह है सीमा विवाद। बांग्लादेश के साथ सीमा विवाद पूर्वोत्तर भारतीय राज्यों के साथ बेहतर संबंध स्थापित करने में बड़ी बाधा बना हुआ है। कई दफा इसी के परिणामस्वरूप सीमा पर गोलीबारी और तनाव देखने को मिलते हैं। कई भारतीय इलाके बांग्लादेशी सीमा से घिरे हुए है। तनाव की वजह से इन इलाकों के लोग बुनियादी सुविधाओं तक से महरूम हैं। कमोबेश यही हालात बांग्लादेशी सीमावर्ती इलाकों का भी है। दोनों मुल्कों के तकरीबन पचास हजार से ज्याद लोग भयावह स्थिति का सामना कर रहे हैं। हालांकि इस दिशा में एक अच्छी बात ये है कि करीब एक सौ बासठ विवादित क्षेत्रों की पहचान की जा चुकी है, जिनकी अदला-बदली होनी है। यदि इस तरह का कोई समझौता होता है तो निश्चित तौर पर भारत-बांग्लादेश के भौगोलिक नक्शे में कुछ बदलाव आएगा। नए सीमा के निर्धारण के बाद उन इलाकों के लोगों की नागरिकता स्वतः बदल जाएगी। समझोते के बाद सीमा पर बाड़ लगाना आसान हो जाएगा। दोनों देशों के बीच स्थायी शांति की दिशा में इस कदम को बेहतर माना जा सकता है।
हालांकि कुछ अलगाववादी ताकतें इसका राजनीतिक लाभ उठाने की जुगत में हैं। यदि भारत की जमीन बांग्लादेश को दी जा रही है तो भारत से ज्यादा जमीन मिल रही है। इसे व्यवहरिक नजरिए से देखने की जरूरत है। यह एक ऐतिहासिक मौका है। ऐसी स्थिति बार-बार नहीं आती। यह दुर्भाग्य ही था कि मुजीबुर्रहमान की हत्या के बाद बांग्लादेश भारत विरोधी कार्रवाईयों का केंद्र बना। जबकि भारत बांग्लादेश की मुक्ति का अहम वाहक रहा है।
मौजूदा बांग्लादेशी प्रधानमंत्री ने मैत्री की दिशा में कुछ बेहतर प्रयास जरूर किए हैं। शेख हसीना ने भारत विरोधियों के खिलाफ अपने कड़े तेवर दिखलाकर स्पष्ट कर दिया है कि उनका नजरिया मित्रता और व्यापार को बढ़ावा देना है। शेख हसीना द्वारा की जा रही पहल और प्रधानमंत्री की इस यात्रा से दोनों मुल्कों की सीमावर्ती इलाकों में शांति बहाली की प्रक्रिया को बल मिलेगा। जाहिर है इसका फायदा दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों पर भी पड़ेगा।