Tuesday, September 6, 2011

मनमोहन की बांग्लादेश यात्रा से सीमा विवाद सुलझने के आसार

प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की पहली बांग्लादेश यात्रा को लेकर दोनों मुल्कों के बीच संबंध और बेहतर होने के कयास लगाए जा रहे हैं। मनमोहन सिंह की इस यात्रा से पूर्वोत्तर राज्यों में उत्पन्न भूमि विवाद को लेकर पनपे दोनों देशों के खटास में भी मधुरता आने के संकेत हैं। इस यात्रा का लाभ पूर्वी राज्यों को तो मिलेगा ही साथ ही वहां जारी आतंकवाद पर भी अंकुश लगेगा।
शेख हसीना के प्रधानमंत्री बनने के बाद दोनों देशों के रिश्तों में सुधार के संकेत मिले हैं। भारत विरोधी गतिविधि के लिए बांग्लादेशी सरजमीं का इस्तेमाल करने वाले चरमपंथियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करके हसीना ने भारत को लेकर अपनी मैत्री नीति का मुजाहिरा किया है। इस कार्रवाई के मद्देनजर बांग्लादेश में आईएसआई और बांग्लादेशी विद्रोहियों द्वारा भारत के खिलाफ चल रही गतिविधियों पर बहुत हद तक अंकुश लगा है।
प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की इस दो दिवसीय यात्रा से दोनों देशों के द्विपक्षीय रिश्तों में नए आयाम जुड़ने की संभावना है। साथ ही इस यात्रा के दौरान बांग्लादेश की सीमा से जुड़े भारतीय राज्यों के मुख्यमंत्रियों को प्रधानमंत्री के प्रतिनिधिमंडल में शामिल किए जाने से यात्रा सकारात्मक रहने की उम्मीद है। भारत के पूर्वी राज्यों में शांति बहाली के लिए बांग्लादेश का सहयोग काफी महत्वपूर्ण है। भारत विभाजल के बाद पूर्वोत्तर के राज्य काफी उपेक्षा का शिकार रहे हैं। एक तरह से कहें तो भारत का यह हिस्सा शेष भारत से लगभग कटा हुआ है। बांग्लादेश के साथ संबंधों में सुधार का एक बड़ा फायदा पूर्वोत्तर के राज्यो को मिलेगा। संबंधों में सुधार आने पर दोनों देशों को व्यापारिक लाभ मिलेंगे। बांग्लादेश भारत के अलावा भारतीय भूमि का इस्तेमाल नेपाल के साथ व्यापारिक रिश्तों के लिए भी कर सकता है। इसका फायदा सीधे तौर पर पूर्वी राज्यों को मिलेगा।
इस यात्रा के दौरान जो सबसे बड़ा पक्ष है वह है सीमा विवाद। बांग्लादेश के साथ सीमा विवाद पूर्वोत्तर भारतीय राज्यों के साथ बेहतर संबंध स्थापित करने में बड़ी बाधा बना हुआ है। कई दफा इसी के परिणामस्वरूप सीमा पर गोलीबारी और तनाव देखने को मिलते हैं। कई भारतीय इलाके बांग्लादेशी सीमा से घिरे हुए है। तनाव की वजह से इन इलाकों के लोग बुनियादी सुविधाओं तक से महरूम हैं। कमोबेश यही हालात बांग्लादेशी सीमावर्ती इलाकों का भी है। दोनों मुल्कों के तकरीबन पचास हजार से ज्याद लोग भयावह स्थिति का सामना कर रहे हैं। हालांकि इस दिशा में एक अच्छी बात ये है कि करीब एक सौ बासठ विवादित क्षेत्रों की पहचान की जा चुकी है, जिनकी अदला-बदली होनी है। यदि इस तरह का कोई समझौता होता है तो निश्चित तौर पर भारत-बांग्लादेश के भौगोलिक नक्शे में कुछ बदलाव आएगा। नए सीमा के निर्धारण के बाद उन इलाकों के लोगों की नागरिकता स्वतः बदल जाएगी। समझोते के बाद सीमा पर बाड़ लगाना आसान हो जाएगा। दोनों देशों के बीच स्थायी शांति की दिशा में इस कदम को बेहतर माना जा सकता है।
हालांकि कुछ अलगाववादी ताकतें इसका राजनीतिक लाभ उठाने की जुगत में हैं। यदि भारत की जमीन बांग्लादेश को दी जा रही है तो भारत से ज्यादा जमीन मिल रही है। इसे व्यवहरिक नजरिए से देखने की जरूरत है। यह एक ऐतिहासिक मौका है। ऐसी स्थिति बार-बार नहीं आती। यह दुर्भाग्य ही था कि मुजीबुर्रहमान की हत्या के बाद बांग्लादेश भारत विरोधी कार्रवाईयों का केंद्र बना। जबकि भारत बांग्लादेश की मुक्ति का अहम वाहक रहा है।
मौजूदा बांग्लादेशी प्रधानमंत्री ने मैत्री की दिशा में कुछ बेहतर प्रयास जरूर किए हैं। शेख हसीना ने भारत विरोधियों के खिलाफ अपने कड़े तेवर दिखलाकर स्पष्ट कर दिया है कि उनका नजरिया मित्रता और व्यापार को बढ़ावा देना है। शेख हसीना द्वारा की जा रही पहल और प्रधानमंत्री की इस यात्रा से दोनों मुल्कों की सीमावर्ती इलाकों में शांति बहाली की प्रक्रिया को बल मिलेगा। जाहिर है इसका फायदा दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों पर भी पड़ेगा।

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