Monday, April 18, 2011

साइबर दुनिया के सामने वजूद खोती किताबें..........





”किताबों का जख़ीरा तुम्हें तलाशता है, यूं ही पढने ना सही, दर्शन के लिए आया तो करो ”
सूनी पड़ी लाइब्रेरी, पुस्तक मेले और प्रदर्शनी शायद अपनी बेबसी का इज़हार कुछ इस तरह ही किया करते हैं। सर्दियों का मौसम आते ही पुस्तक मेले और प्रदर्शनी की बयार सी आ जाती है। जगह-जगह इस तरह के पुस्तक मेले और प्रदर्शनी खूब देखने को मिलते हैं। दुनिया भर के पब्लिशर्स से पुस्तक मेला गुलज़ार रहता है।
दरअसल सर्दियों का मौसम घूमने टहलने के लिहाज़ से अच्छा माना जाता है शायद इसलिए ऐसे आयोजनों को इस सीज़न में रखने का मकसद ज़्यादा से ज़्यादा लोगों का रूख इस तरफ करना होता है। अगर इसका मकसद वाकई ज़्यादा से ज़्यादा लोगों का मेले और प्रदर्शनी की ओर ध्यान आकर्षित करना है तो पब्लिशर्स इस मामले में शत प्रतिशत अपने आप को कामयाब पाते होंगे, क्योंकि इस तरह की प्रदर्शनी और मेले अब फैमिली विकेन्ड की छुट्टी बिताने की जगह ले चुके हैं।
बड़े बुज़ुर्ग हमेशा कहते हैं कि किताबें सबसे अच्छी दोस्त होती हैं। आज के इस साइबर वर्ल्ड में शायद यह बात फीकी सी नज़र आती है। लाइब्रेरी और घर के आलमीरे में पड़ी किताबें धूल फांक रही हैं। लोगों के पढने की आदतों में बीते कुछ सालों के दौरान तेज़ी से गिरावट आई है। इस सब के पीछे जो एक वजह नज़र आती ह,ै वह है साइबर दुनिया का तेज़ी से हो रहा विस्तार। आज की दुनिया के लोगों के पास बहुत समयाभाव है। लोग इतनी जल्दी में हैं कि एसएमएस पढने तक में परेशानी महसूस करते हैं, अब तो मोबाइल पर मैसेज लिखने की एक अतिसूक्ष्म शैली का विकास हो चुका है।

हाल ही में आईआईएमसी में इसी तरह की पुस्तक प्रदर्शनी लगी थी। मीडिया संस्थान होने की वजह से यहां पर ज़्यादातर किताबें मीडिया से ही संबंधित थीं। कॉलेज के बच्चों को इस प्रदर्शनी को देखने और इस पर एक फीचर लिखने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई। छात्रों का पुस्तकों की ओर अचानक से रूख करना और माथे पर आया शिकन उनके असाइनमेंट के बोझ तले दबे होने का एहसास करा रहा था, न कि किताबों के प्रति उनके प्रेम को दर्शा रहा था।  आईआईएमसी की लाइब्रेरी काफी  समृद्ध  है लेकिन ज़्यादातर वक्त सूनी पड़ी रहती है। आजकल पढाने की एक ऐसी कला का विकास हुआ है जहां किताबों की जगह पीपीटी (पावर प्वाइंट) ने ले रखी है। ज़्यादातर अध्यापक भी अब इसी शैली का प्रयोग करते नज़र आते हैं। ज़ाहिर है छात्र भी इसी तरीके को अपनाएंगे। किताबों का महंगा होना भी एक बड़ा कारण है। जो सामग्री आप 40-50 रूपये में इंटरनेट पर पाते हैं उन्हीं चीज़ों के लिए आपको किताबों के उपर हजारों ख़र्च करने पड़ते हैं।
किताबों से लोगों की दूरियां दिन ब दिन बढती ही जा रहीं हैं। अब तो संकट यह खड़ा हो गया है कि आखिर कैसे लोगों में किताब पढने की आदत का विकास किया जाए। थर्ड जेनेरेशन के इस दौर में यह एक मुश्किल चुनौती के रूप में सामने आने वाली है !!!


सोशल नेटवर्किंग : वैकल्पिक मीडिया का नया चेहरा


2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला हो या  फिर मध्य-पूर्व में शासकों की तानाशाही अब कोई भी जानकारी पोशीदा नहीं होती. मुख्यधारा की पत्रकारिता भले ही इन घोटालों, अराजकता और तानाशाही को छुपाने की लाख कोशिश करे लेकिन वैकल्पिक माध्यमों ने इसका पर्दाफाश करने में अहम् भूमिका निभायी है. वैसे तो वैकल्पिक माध्यम कोई नई चीज़ नहीं पर तकनीक के विस्तार और इंटरनेट की दुनिया ने सूचनाओं की पारदर्शिता को और गति दी है.
आर्थिक उदारीकरण के बाद पत्रकारिता के चरित्र में व्यापक बदलाव देखने को मिले. पत्रकारिता शब्द धीरे-धीरे गायब होता गया. मिशन जैसी कोई चीज़ नहीं रह गई. पत्रकारिता की जगह मीडिया ने ले ली जिस पर कारपोरेटीकरण की पूरी मुहर लग चुकी थी. अन्य व्यवसायों की तरह मीडिया भी एक व्यवसाय मात्र रह गया, जहाँ पत्रकारों की जगह मीडिया प्रोफेशनल्स ने ले ली. अखबार एक प्रोडक्ट बन चुका था. अखबार मालिकों ने अखबार को प्रोडक्ट के रूप में पेश करना शुरू किया.
इसी दरम्यान सूचना क्रांति का दौर शुरू हुआ. संचार के नए-नए माध्यम प्रकाश में आए जहाँ हर किसी को अभिव्यक्ति का एक प्लेटफ़ॉर्म मिला. नए-नए वेब पोर्टल्स का चलन शुरू हुआ. ब्लॉगिंग की शुरुआत के बाद इस दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिले. ब्लॉगिंग मुफ्त होने की वजह से ज्यादा से ज्यादा लोग इस तरफ आकर्षित हुए. देश दुनिया से जुड़े कई मुद्दे, घटनाएं जिन्हें मुख्यधारा में जगह नहीं मिलती थी, ब्लॉग पोस्ट के माध्यम से लोगों तक पहुँचने लगीं.
इसी कड़ी में सोशल नेटवर्किंग साईट के आने के बाद सूचनाओं के प्रसार का और विस्तार हुआ. ऑरकुट, फेसबुक, ट्विटर आदि सोशल नेटवर्किंग साईट काफी लोकप्रिय साबित हुईं. इस तरह के साईट को एक बड़े बदलाव के रूप में इस तरह भी देखा जा सकता है कि इसने युवाओं को काफी प्रभावित किया और उनमे एक नयी चेतना का विकास हुआ. फेसबुक, ट्विटर युवाओं के लिए सिर्फ चैटिंग का माध्यम नहीं रह गया. देश दुनिया से जुड़े आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक पहलु पर भी बहस होने लगी. राजनैतिक रूप से शिथिल हो चुकी आज कि युवा पीढ़ी में भी चेतना का विकास हुआ. इसका ताज़ा उदाहरण मिस्र में हुई क्रांति और मध्य-पूर्व में तानाशाही के खिलाफ आवाज़ के रूप में सामने आया. मिस्र में होस्नी मुबारक कि विदाई में फेसबुक कि अहम् भूमिका रही. फेसबुक के ज़रिए ही युवाओं ने होस्नी के खिलाफ मोर्चा खोला और जनता सड़क पर आ गई. 
इस कड़ी में हालिया उदाहरण भारत का भी लिया जा सकता है. भ्रष्टाचार के खिलाफ इण्डिया अगेंस्ट करप्शन मुहीम को लेकर फेसबुक और तमाम तरह के सोशल मीडिया के माध्यम से युवाओं में चेतना लायी गई. नतीजा यह हुआ कि मुख्यधारा कि मीडिया में भी अन्ना हजारे के जनलोकपाल विधेयक के लिए किये गए अनशन को व्यापक कवरेज मिली. इससे पहले तक  भ्रष्टाचार का मुद्दा या तो चलती फिरती शक्ल में उठाया गया या फिर इस मुद्दे को टीआरपी के अनुकूल नहीं होने कि वजह से मीडिया ने हमेशा ही तीसरे दर्जे पर रखा.
 विकिलीक्स के सनसनीखेज़ खुलासे के बाद तो जैसे तूफ़ान ही उठ खड़ा हुआ. उच्चस्तरीय राजनैतिक भ्रष्टाचार कि खबरें पहले विकिलीक्स, यू-ट्यूब जैसे वैकल्पिक माध्यम के ज़रिए ही लोगों तक पहुँचीं. इसका असर यह हुआ कि मेनस्ट्रीम मीडिया को भी वैकल्पिक माध्यमों का ही सहारा लेना पड़ा.


सोशल मीडिया कि ताकत दिन-ब-दिन बढती जा रही है और इसका असर  बहुत ही  व्यापक हो रहा है. हाल के वर्षों में वैकल्पिक माध्यमों के प्रसार ने जिस तरह मुख्यधारा की मीडिया को चुनौती दी है और फेसबुक, ट्विटर के ज़रिए लगातार हो रही सामाजिक, राजनैतिक बहसों को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि इस तरह के माध्यम वैकल्पिक मीडिया का का नया चेहरा बनता जा रहा है.....