Monday, April 18, 2011

सोशल नेटवर्किंग : वैकल्पिक मीडिया का नया चेहरा


2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला हो या  फिर मध्य-पूर्व में शासकों की तानाशाही अब कोई भी जानकारी पोशीदा नहीं होती. मुख्यधारा की पत्रकारिता भले ही इन घोटालों, अराजकता और तानाशाही को छुपाने की लाख कोशिश करे लेकिन वैकल्पिक माध्यमों ने इसका पर्दाफाश करने में अहम् भूमिका निभायी है. वैसे तो वैकल्पिक माध्यम कोई नई चीज़ नहीं पर तकनीक के विस्तार और इंटरनेट की दुनिया ने सूचनाओं की पारदर्शिता को और गति दी है.
आर्थिक उदारीकरण के बाद पत्रकारिता के चरित्र में व्यापक बदलाव देखने को मिले. पत्रकारिता शब्द धीरे-धीरे गायब होता गया. मिशन जैसी कोई चीज़ नहीं रह गई. पत्रकारिता की जगह मीडिया ने ले ली जिस पर कारपोरेटीकरण की पूरी मुहर लग चुकी थी. अन्य व्यवसायों की तरह मीडिया भी एक व्यवसाय मात्र रह गया, जहाँ पत्रकारों की जगह मीडिया प्रोफेशनल्स ने ले ली. अखबार एक प्रोडक्ट बन चुका था. अखबार मालिकों ने अखबार को प्रोडक्ट के रूप में पेश करना शुरू किया.
इसी दरम्यान सूचना क्रांति का दौर शुरू हुआ. संचार के नए-नए माध्यम प्रकाश में आए जहाँ हर किसी को अभिव्यक्ति का एक प्लेटफ़ॉर्म मिला. नए-नए वेब पोर्टल्स का चलन शुरू हुआ. ब्लॉगिंग की शुरुआत के बाद इस दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिले. ब्लॉगिंग मुफ्त होने की वजह से ज्यादा से ज्यादा लोग इस तरफ आकर्षित हुए. देश दुनिया से जुड़े कई मुद्दे, घटनाएं जिन्हें मुख्यधारा में जगह नहीं मिलती थी, ब्लॉग पोस्ट के माध्यम से लोगों तक पहुँचने लगीं.
इसी कड़ी में सोशल नेटवर्किंग साईट के आने के बाद सूचनाओं के प्रसार का और विस्तार हुआ. ऑरकुट, फेसबुक, ट्विटर आदि सोशल नेटवर्किंग साईट काफी लोकप्रिय साबित हुईं. इस तरह के साईट को एक बड़े बदलाव के रूप में इस तरह भी देखा जा सकता है कि इसने युवाओं को काफी प्रभावित किया और उनमे एक नयी चेतना का विकास हुआ. फेसबुक, ट्विटर युवाओं के लिए सिर्फ चैटिंग का माध्यम नहीं रह गया. देश दुनिया से जुड़े आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक पहलु पर भी बहस होने लगी. राजनैतिक रूप से शिथिल हो चुकी आज कि युवा पीढ़ी में भी चेतना का विकास हुआ. इसका ताज़ा उदाहरण मिस्र में हुई क्रांति और मध्य-पूर्व में तानाशाही के खिलाफ आवाज़ के रूप में सामने आया. मिस्र में होस्नी मुबारक कि विदाई में फेसबुक कि अहम् भूमिका रही. फेसबुक के ज़रिए ही युवाओं ने होस्नी के खिलाफ मोर्चा खोला और जनता सड़क पर आ गई. 
इस कड़ी में हालिया उदाहरण भारत का भी लिया जा सकता है. भ्रष्टाचार के खिलाफ इण्डिया अगेंस्ट करप्शन मुहीम को लेकर फेसबुक और तमाम तरह के सोशल मीडिया के माध्यम से युवाओं में चेतना लायी गई. नतीजा यह हुआ कि मुख्यधारा कि मीडिया में भी अन्ना हजारे के जनलोकपाल विधेयक के लिए किये गए अनशन को व्यापक कवरेज मिली. इससे पहले तक  भ्रष्टाचार का मुद्दा या तो चलती फिरती शक्ल में उठाया गया या फिर इस मुद्दे को टीआरपी के अनुकूल नहीं होने कि वजह से मीडिया ने हमेशा ही तीसरे दर्जे पर रखा.
 विकिलीक्स के सनसनीखेज़ खुलासे के बाद तो जैसे तूफ़ान ही उठ खड़ा हुआ. उच्चस्तरीय राजनैतिक भ्रष्टाचार कि खबरें पहले विकिलीक्स, यू-ट्यूब जैसे वैकल्पिक माध्यम के ज़रिए ही लोगों तक पहुँचीं. इसका असर यह हुआ कि मेनस्ट्रीम मीडिया को भी वैकल्पिक माध्यमों का ही सहारा लेना पड़ा.


सोशल मीडिया कि ताकत दिन-ब-दिन बढती जा रही है और इसका असर  बहुत ही  व्यापक हो रहा है. हाल के वर्षों में वैकल्पिक माध्यमों के प्रसार ने जिस तरह मुख्यधारा की मीडिया को चुनौती दी है और फेसबुक, ट्विटर के ज़रिए लगातार हो रही सामाजिक, राजनैतिक बहसों को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि इस तरह के माध्यम वैकल्पिक मीडिया का का नया चेहरा बनता जा रहा है.....
   

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