”किताबों का जख़ीरा तुम्हें तलाशता है, यूं ही पढने ना सही, दर्शन के लिए आया तो करो ”सूनी पड़ी लाइब्रेरी, पुस्तक मेले और प्रदर्शनी शायद अपनी बेबसी का इज़हार कुछ इस तरह ही किया करते हैं। सर्दियों का मौसम आते ही पुस्तक मेले और प्रदर्शनी की बयार सी आ जाती है। जगह-जगह इस तरह के पुस्तक मेले और प्रदर्शनी खूब देखने को मिलते हैं। दुनिया भर के पब्लिशर्स से पुस्तक मेला गुलज़ार रहता है।
दरअसल सर्दियों का मौसम घूमने टहलने के लिहाज़ से अच्छा माना जाता है शायद इसलिए ऐसे आयोजनों को इस सीज़न में रखने का मकसद ज़्यादा से ज़्यादा लोगों का रूख इस तरफ करना होता है। अगर इसका मकसद वाकई ज़्यादा से ज़्यादा लोगों का मेले और प्रदर्शनी की ओर ध्यान आकर्षित करना है तो पब्लिशर्स इस मामले में शत प्रतिशत अपने आप को कामयाब पाते होंगे, क्योंकि इस तरह की प्रदर्शनी और मेले अब फैमिली विकेन्ड की छुट्टी बिताने की जगह ले चुके हैं।
बड़े बुज़ुर्ग हमेशा कहते हैं कि किताबें सबसे अच्छी दोस्त होती हैं। आज के इस साइबर वर्ल्ड में शायद यह बात फीकी सी नज़र आती है। लाइब्रेरी और घर के आलमीरे में पड़ी किताबें धूल फांक रही हैं। लोगों के पढने की आदतों में बीते कुछ सालों के दौरान तेज़ी से गिरावट आई है। इस सब के पीछे जो एक वजह नज़र आती ह,ै वह है साइबर दुनिया का तेज़ी से हो रहा विस्तार। आज की दुनिया के लोगों के पास बहुत समयाभाव है। लोग इतनी जल्दी में हैं कि एसएमएस पढने तक में परेशानी महसूस करते हैं, अब तो मोबाइल पर मैसेज लिखने की एक अतिसूक्ष्म शैली का विकास हो चुका है।
हाल ही में आईआईएमसी में इसी तरह की पुस्तक प्रदर्शनी लगी थी। मीडिया संस्थान होने की वजह से यहां पर ज़्यादातर किताबें मीडिया से ही संबंधित थीं। कॉलेज के बच्चों को इस प्रदर्शनी को देखने और इस पर एक फीचर लिखने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई। छात्रों का पुस्तकों की ओर अचानक से रूख करना और माथे पर आया शिकन उनके असाइनमेंट के बोझ तले दबे होने का एहसास करा रहा था, न कि किताबों के प्रति उनके प्रेम को दर्शा रहा था। आईआईएमसी की लाइब्रेरी काफी समृद्ध है लेकिन ज़्यादातर वक्त सूनी पड़ी रहती है। आजकल पढाने की एक ऐसी कला का विकास हुआ है जहां किताबों की जगह पीपीटी (पावर प्वाइंट) ने ले रखी है। ज़्यादातर अध्यापक भी अब इसी शैली का प्रयोग करते नज़र आते हैं। ज़ाहिर है छात्र भी इसी तरीके को अपनाएंगे। किताबों का महंगा होना भी एक बड़ा कारण है। जो सामग्री आप 40-50 रूपये में इंटरनेट पर पाते हैं उन्हीं चीज़ों के लिए आपको किताबों के उपर हजारों ख़र्च करने पड़ते हैं।
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