देश-दुनिया में नौजवान तबके की रोजमर्रा
की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुकी सोशल नेटवर्किग साइटों पर प्रतिबंध को समाज का एक
बड़ा हिस्सा फ्रीडम ऑफ स्पीच पर हमला मान रहा है। सोशल साइटों को लेकर सरकार के
रूख को लेकर सवाल उठ रहे हैं। देश में ही नहीं समूची दुनिया भर में सरकार के इस
कदम की आलोचना हो रही है। एक तरफ सरकार अपने प्रतिबंधों को जायज़ ठहराने में लगी
है और ये तर्क दे रही है कि असम हिंसा और बाहरी मुल्कों खासकर पाकिस्तान के ज़रिए भारत
विरोधी गतिविधि के लिए साइबर टेररिज़म का सहारा लिया जा रहा है। तो वहीं देश के
पढ़े लिखे इंटेलेक्ट क्लास की नज़र में सरकार का ये रूख अपनी राय बताने वाले सोशल
मीडिया के प्लैटफॉर्म को ग़ायब करने की साज़िश है। इन बुद्धिजीवियों का तर्क भी कई
मायनों में जायज़ है। इसे हाल के दिनों में हुए कार्टून विवाद से लेकर मौजूदा
एसएमएस पर अंकुश लगाए जाने तक समझा जा सकता है।
हालिया कुछ महीनो में जिस तरह सरकार
विरोधी आंदोलन और अभियान चले और उसके बाद सरकार के इस रूख को लेकर बहस छिड़ी है। सरकार
के इस कदम पर पूरे देश में ही नहीं साइबर दुनिया में भी तीखी प्रतिक्रिया है। जिस
तरह गूगल, फेसबुक, ट्विटर, आरकुट
और यूटय़ूब से आनन फानन में सैंकड़ों कंटेंट को भड़काऊ बताकर उन्हें ब्लॉक किया गया
है, उसे इन साइटों का
इस्तेमाल करने वालों के अलावा भी देश का बड़ा तबका सूचना की आजादी के लिए बड़ा
खतरा मान रहा है।
आम लोगों की इस आशंका के पीछे जायज कारण
भी हैं। पिछले साल 7 दिसम्बर को सर्च इंजन गूगल को 358 आइटम हटाने के लिए सरकार ने
कहा। इसमें 255 आइटम सरकार की आलोचना के थे। यही हाल आरकुट का था उसके 236 और यू-ट्यूब के 19 जिन
आइटमों को हटाने के लिए कहा गया उन सभी में कहीं न कहीं सरकार को कटघरे में खड़ा
करने वाले कंटेंट की मौजूदगी से इनकार नहीं किया जा सकता है। इससे पहले 6 दिसम्बर
को केंद्रीय संचार मंत्री कपिल सिब्बल ने सोशल मीडिया साइटस और इंटरनेट कंपनियां
गूगल, फेसबुक, याहू और
माइक्रोसॉफ्ट के अधिकारियों के साथ बैठक कर आपतिजनक सामग्री पर अपनी मुखालिफत दर्ज
करायी थी। उसमें भी ज्यादातर सामग्री में सत्तापक्ष के नेताओं के कार्टून थे।
हालांकि इसमें कुछ कार्टून तो सही में अश्लील श्रेणी में आते थे लेकिन कुछ ऐसे नहीं थे जिनको लेकर सरकार के अंदर
इतनी हलचल पैदा हो।
सरकार के ताजा प्रतिबंधों में अफरातफरी का
आलम इसी से ही पता चलता है कि केंद्रीय सूचना तकनीकी राज्य मंत्री मिलिंद देवड़ा
का ट्विटर एकांउट ब्लॉक कर दिया गया। बाद में भले ही ट्विटर ने इसके लिए माफी
मांगी। अफवाहें रोकने के सरकार के इस दावे की कलई तब और खुली जब ब्लॉक होने वाले
एकाउंट में कुछ जाने माने पत्रकार भी शामिल हो गए। ऐसा नहीं है कि देश में पहली
बार इस तरह की सेंसरशिप हुई हो। पहले भी कई मौकों पर इंटरनेट और सूचना की आज़ादी पर प्रतिबंध लगाए गए
हैं लेकिन तब कारण अलग थे। पिछले कुछ समय से जिस तरह से एसएमएस, कार्टून, और इंटरनेट
सर्विस प्रोवाइडर को फरमान जारी किए गए हैं, उसे साफ तौर पर सरकार की आलोचना का
मुंह बंद करने जैसी कार्रवाई माना जा रहा है।
सत्तापक्ष में बैठे लोग मौजूदा सेंसरशिप
को असम हिंसा से जोड़ रही है। लेकिन देखा जाए तो यह राजनीतिक निर्णय है जिसके पीछे पिछले काफी समय
से तमाम घोटाले के चक्रव्यूह में घिरी सरकार और उसके खिलाफ हुए अन्ना हजारे और
बाबा रामदेव के आंदोलनों की घबराहट छिपी हुई है। सोशल साइट्स पर सरकार के शिकंजे
को प्रशासनिक निर्णय कम सरकार की नाकामियों को छिपाने के एजेंडे के रूप में ज्यादा
देखा जा रहा है।
सूचना और अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर फिलहाल
जो बहस छिड़ी है वह जहां अभिव्यक्ति की आजादी के लिए शुभ संकेत हैं वहीं शरारती तत्वों
के लिए अराजकता फैलाने का हथियार भी है। इसकी आड़ में उन लोगों को भी मौका मिलेगा
जो दूषित मानसिकता के चलते अश्लीलता और हिंसा को बढ़ावा देने का दुष्प्रचार करने
का मौका ढूंढते रहते हैं। संवाद का यह प्रभावी माध्यम समाज के लिए एक आइने की तरह
है इसलिए इस पर कोई निर्णय लेने से पहले सरकार को पारदर्शिता बरतनी चाहिए।