Thursday, April 3, 2014

पावन बूंद


काश कि बारिश की बूंदोँ से मन भी भीग पाता
धुल जाते सारे दाग़ कुछ बुरे, कुछ अच्छे
हो जाते फिर से सच्चे जैसे कुम्हलाते बच्चे
कोरे काग़ज़ से मन मेँ कुछ चित्र बनाते अच्छे

ज्योँहि उन गिरती बूंदोँ का एक झरना बहता जाता
उन लहराती नीरोँ पर एक तरणताल बनाते
विश्वास से गहरे सागर मेँ कच्ची नावेँ दौड़ाते

काश कि बारिश की बूंदोँ से मन भी भीग पाता

सावन की पावन बूंदोँ का जो झोँका बहता आता
उन झोँकोँ से कटती मिट्टी का छोटा दीया बनाते
उस एक दीये की ज्वाला से कोई दूर अंधेरा जाता
सब दाग़ हमारे धुल जाते और मन रोशन हो जाता

काश कि बारिश की बूंदोँ से मन भी भीग पाता

सब दाग़ हमारे धुल जाते और मन रोशन हो जाता


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