Saturday, March 24, 2012

ज़िद


ज़िद

कल रात मेरे सपनों में तुम
फिर यूँ अचानक आयी थी
उस सर्द से अँधेरे शब में
एक गर्म सवेरा लायी थी
फिर चुपके से सरहाने में
एक नर्म सी सांसों कि खुशबू
बेताब निगाहों का जादू,
वो काली घटा सी ज़ुल्फ़ तेरी
मदहोशी बनकर छाई थी


हम सारी रात न सोये थे
एक दूजे में ही खोये थे
तेरे होठों के शबनम ने
मेरे खुश्क लबों को भिगोए थे
फिर जैसे जैसे रात कटी
मायूसी, आकर पास सटी




एहसास मुझे तब होने लगा
ये ख्वाब ही था, जो सच्चा लगा
बेचारे दिल को समझाया
इक आस दिया और बहलाया

गर ख्वाब में आकर जाना है
ताबीरों में उलझाना है..
तो मेरी भी तू ज़िद सुन ले
तूने मुझको क्या जाना है

अब तो मुझको पाना होगा
हर रात उसे आना होगा....
फिर आकर न जाना होगा....

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